Solar Rooftop Policy: फ्री नहीं मिलेगी अपनी बिजली, बढ़े रेट

मध्यप्रदेश में सोलर बिजली का उपयोग अब महंगा होगा। मप्र विद्युत नियामक आयोग के नए टैरिफ के बाद 300 यूनिट पर ₹600 फिक्स्ड चार्ज देना होगा। जानिए पूरी गणित यहाँ।

April 3, 2026 9:06 AM
Solar Rooftop Policy

Solar Rooftop लगाया तो भी नहीं बचेगा बिल — MP में अब 600 रुपए फिक्स्ड चार्ज

नई व्यवस्था के तहत 300 यूनिट सोलर बिजली ग्रिड में देकर बाद में उपयोग करने पर उपभोक्ता को 600 रुपए नियत प्रभार देना होगा।

एक तरफ केंद्र और राज्य सरकारें ग्रीन एनर्जी नीति के तहत रूफटॉप सोलर को बढ़ावा देने की बात कर रही हैं, वहीं मध्यप्रदेश में MPERC टैरिफ आदेश 2025 के बाद अपने घर की सोलर बिजली का उपयोग ही देश के सबसे महंगे मॉडल में बदलता दिख रहा है। मप्र विद्युत नियामक आयोग के नए टैरिफ आदेश के बाद अब ऐसे उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है, जो दिन में अपने सोलर प्लांट से अतिरिक्त बिजली ग्रिड में भेजते हैं और रात में जरूरत पड़ने पर वही बिजली वापस लेते हैं।

नई व्यवस्था के तहत 300 यूनिट सोलर बिजली ग्रिड में देकर बाद में उपयोग करने पर उपभोक्ता को 600 रुपए मध्यप्रदेश सोलर नियत प्रभार देना होगा। पहले यही राशि 560 रुपए थी। यानी सोलर अपनाने वाले उपभोक्ताओं को अब हर महीने ज्यादा फिक्स्ड चार्ज देना पड़ेगा। यह व्यवस्था खासतौर पर घरेलू सोलर उपभोक्ताओं को प्रभावित करेगी, क्योंकि अधिकांश घरों में बैटरी स्टोरेज की सुविधा नहीं होती और दिन में अतिरिक्त बिजली को ग्रिड में भेजना उनकी मजबूरी होती है। यदि पैदा की गई बिजली ग्रिड में न देकर सीधे उपयोग कर ली जाती है तब इन हालातों में उपभोक्ता को कोई शुल्क नहीं देना पड़ता।

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मध्यप्रदेश सोलर नियत प्रभार: पिछले साल से अब तक क्या बदला?

बीते साल सोलर ऊर्जा पर नियत प्रभार की दरें प्रति 15 यूनिट पर 28 रुपए थीं। इस तरह जो उपभोक्ता महीने में 300 यूनिट बिजली ग्रिड में लेकर उसका उपयोग करता था तो उसे प्रति 15 यूनिट के हिसाब से 300 यूनिट के 560 रुपए नियत प्रभार देने होते थे। अब 600 रुपए देने होंगे।

दिल्ली, राजस्थान, महाराष्ट्र में सोलर नीति — MP से कितना फर्क?

देश के अलग-अलग राज्यों में नेट मीटरिंग और नेट बिलिंग की व्यवस्था एक-दूसरे से काफी अलग है। नेट बिलिंग बनाम नेट मीटरिंग का यह फर्क सीधे तौर पर उपभोक्ता की जेब पर असर डालता है:

मध्यप्रदेश: 300 यूनिट ग्रिड से वापस लेने पर 600 रुपए नियत प्रभार (पहले 560)

दिल्ली: 3 केवी तक कुल सब्सिडी 1.08 लाख रुपए (78,000 केंद्र + 30,000 राज्य टॉप-अप), नेट-मीटरिंग को बढ़ावा

राजस्थान: अतिरिक्त सोलर बिजली पर 3.26 रुपए प्रति यूनिट (नेट-मीटरिंग), 3.65 रुपए प्रति यूनिट (नेट-बिलिंग)

महाराष्ट्र: अतिरिक्त सोलर बिजली पर करीब 2.82 रुपए प्रति यूनिट भुगतान ढांचा/प्रस्ताव, सालाना सेटलमेंट मॉडल

रूफटॉप सोलर लगाने के बाद भी उपभोक्ता पर पड़ने वाला असली वित्तीय बोझ

  • 300 यूनिट पर हर महीने 600 रुपए अतिरिक्त बोझ
  • सोलर लगाकर भी रात की बिजली महंगी पड़ेगी
  • बैटरी स्टोरेज सोलर सिस्टम नहीं है तो ग्रिड में बिजली देना मजबूरी
  • घरेलू बिजली बिल जीरो होने का सपना कमजोर पड़ेगा
  • रूफटॉप सोलर लागत वसूली में ज्यादा समय लगेगा
  • अतिरिक्त सोलर बिजली क्रेडिट दर के रूप में समायोजन — नकद राशि नहीं
  • दूसरे राज्यों की तुलना में एमपी में फायदा कम, वसूली ज्यादा

सोलर बिजली ग्रिड में दें तो मिलती है सिर्फ आधी कीमत — यहाँ जानें कैसे

दरअसल, दिन के समय तेज धूप में सोलर पैनल घर की जरूरत से ज्यादा बिजली पैदा करते हैं। घरेलू उपभोक्ता उस अतिरिक्त बिजली को स्टोर नहीं कर पाते, इसलिए वह बिजली ग्रिड में चली जाती है। शाम और रात में जब सोलर दिन की बिजली का उत्पादन बंद हो जाता है, तब वही उपभोक्ता डिस्कॉम से बिजली लेते हैं।

उपभोक्ता सोलर बिजली पैदा कर ग्रिड में दे रहे हैं। इसके लिए उन्हें हर महीने आने वाले बिल में जमा बिजली के प्रति यूनिट 2.15 रुपए के हिसाब से क्रेडिट होकर आते हैं। मतलब बिलिंग यूनिट से लगभग आधी राशि ही अतिरिक्त सोलर बिजली क्रेडिट दर के रूप में दी जाती है।

MPERC टैरिफ और सालाना सेटलमेंट पर विशेषज्ञ राजेंद्र अग्रवाल की राय

ऊर्जा मामलों के जानकार राजेंद्र अग्रवाल का कहना है कि बिजली कंपनी सालाना सेटलमेंट का तरीका अपनाती है — सोलर बिजली पैदा करने और उसे ग्रिड में देने वाले उपभोक्ताओं का हिसाब-किताब साल में सिर्फ एक बार सितंबर में देखती है। अक्टूबर महीने के बिल में कंपनियों की ओर से जमा बिजली की राशि क्रेडिट होकर आती है। उक्त राशि का समायोजन आने वाले बिलों में होता है, नकद राशि नहीं मिलती — जो कि मिलनी चाहिए।

अग्रवाल ने कहा कि इसके लिए अगस्त 2025 से लेकर अब तक प्रधानमंत्री को दो बार पत्र लिख चुका हूं।

जब तक नीति नहीं बदलती, रूफटॉप सोलर निवेश का फायदा पूरी तरह लेना मध्यप्रदेश के उपभोक्ताओं के लिए मुश्किल बना रहेगा — और यह सिर्फ एक राय नहीं, बल्कि हर महीने के बिल में दिखने वाला सच है।

FAQ: रूफटॉप सोलर और MP बिजली बिल से जुड़े असली सवाल

घरेलू सोलर उपभोक्ता को हर महीने कितना फिक्स्ड चार्ज देना होता है?

MPERC के नए टैरिफ आदेश के बाद अब 300 यूनिट ग्रिड से वापस लेने पर 600 रुपए नियत प्रभार देना होगा। पहले यही राशि 560 रुपए थी — यानी एक महीने में 40 रुपए की बढ़ोतरी हुई है। यह चार्ज सिर्फ उन्हीं उपभोक्ताओं पर लागू होता है जो दिन में अतिरिक्त सोलर बिजली ग्रिड में देते हैं और रात में वापस लेते हैं। अगर बैटरी स्टोरेज सोलर सिस्टम है और ग्रिड का इस्तेमाल नहीं करते, तो यह चार्ज नहीं लगेगा। टिप: अगर सोलर सिस्टम नया लगवा रहे हैं, तो इंस्टॉलर से पहले ही पूछें कि बैटरी बैकअप जोड़ने का खर्च कितना होगा।

MP में सोलर नेट मीटरिंग लगाने के बाद बिजली बिल जीरो हो सकता है क्या?

सीधे जवाब — पूरी तरह जीरो होना अब उतना आसान नहीं रहा। 600 रुपए का मासिक नियत प्रभार तो हर हाल में देना होगा, चाहे पूरे महीने ग्रिड से एक यूनिट भी न लें। ऊपर से जो अतिरिक्त बिजली ग्रिड में देते हैं, उस पर क्रेडिट सिर्फ 2.15 रुपए प्रति यूनिट मिलता है — जबकि वही बिजली बाद में 6 से 8 रुपए प्रति यूनिट की दर पर वापस खरीदनी पड़ती है। 3 किलोवाट सोलर सिस्टम वाले एक औसत परिवार के लिए यह फर्क साल में 8,000 से 12,000 रुपए तक पड़ सकता है।

सोलर पैनल लगाने के बाद रात की बिजली का खर्च कैसे कम करें?

रात में सोलर उत्पादन बंद होता है, इसलिए डिस्कॉम से बिजली लेनी ही पड़ती है — यह हकीकत है। इसे कम करने के दो तरीके हैं: एक, बैटरी स्टोरेज सिस्टम जोड़ें जो दिन की अतिरिक्त बिजली को रात के लिए संभालकर रखे। दो, रात के भारी उपकरण जैसे गीजर, वाशिंग मशीन को दिन में चलाने की आदत डालें। बैटरी का शुरुआती खर्च ज्यादा है — करीब 50,000 से 80,000 रुपए — लेकिन लंबे समय में ग्रिड पर निर्भरता घटती है और नियत प्रभार से भी बचाव होता है। टिप: लिथियम फेरोफॉस्फेट (LFP) बैटरी सामान्य लेड-एसिड से ज्यादा टिकाऊ होती है।

अतिरिक्त सोलर बिजली का पैसा क्या सीधे बैंक खाते में आता है?

नहीं — और यही वह बात है जो ज्यादातर लोगों को सोलर लगाने के बाद पता चलती है। MP में अतिरिक्त बिजली का नकद भुगतान नहीं होता, सिर्फ डिस्कॉम बिजली समायोजन के रूप में बिल में क्रेडिट मिलता है। वह क्रेडिट भी साल में एक बार — सितंबर में — सेटल होता है और अक्टूबर के बिल में दिखता है। अगर किसी महीने क्रेडिट बिल से ज्यादा है, तो वह अगले महीने आगे खिसकता रहता है, नकद वापस नहीं मिलता। राजस्थान और महाराष्ट्र में नेट-मीटरिंग का मॉडल थोड़ा बेहतर है, जहाँ प्रति यूनिट दर भी ज्यादा है।

पीएम सूर्य घर योजना के तहत MP में सोलर लगाने पर क्या फायदा मिलता है?

पीएम सूर्य घर योजना के तहत केंद्र सरकार 1 से 2 किलोवाट सिस्टम पर 30,000 से 60,000 रुपए तक की सब्सिडी देती है। लेकिन यह सब्सिडी सिस्टम लगाने के शुरुआती खर्च पर है — इसके बाद हर महीने की टैरिफ व्यवस्था वही रहती है जो MPERC तय करती है। दिल्ली जैसे राज्यों में इसके ऊपर राज्य सरकार अलग से 30,000 रुपए टॉप-अप देती है, जबकि MP में ऐसा कोई अतिरिक्त प्रावधान अभी नहीं है। सोलर लगाने से पहले सिर्फ सब्सिडी नहीं, बल्कि मासिक टैरिफ संरचना भी जरूर देखें।

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