Jihadi Drug Captagon क्या है और भारत में यह क्यों पकड़ी गई?
नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने देश में पहली बार ‘जिहादी ड्रग’ नाम से कुख्यात कैप्टागन (Captagon) की बहुत बड़ी खेप जब्त की है. खाड़ी देशों और सीरिया के जंग के मैदानों में तबाही मचाने वाला यह खतरनाक नशा अब भारतीय सरजमीं पर दस्तक दे चुका है. गृह मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों ने एक सीरियाई नागरिक को दबोचकर इस अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट का पर्दाफाश किया है. इस कार्रवाई ने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े कर दिए हैं क्योंकि इस केमिकल का सीधा कनेक्शन आतंकी संगठनों से रहा है.
Captagon ड्रग का इतिहास क्या है
इराक और अफगानिस्तान के मोर्चे पर तैनात अमेरिकी फौजियों को मुठभेड़ के दौरान अक्सर एक अजीब तजुर्बा होता था. उनके कमांडर और युद्ध कवर कर रहे पत्रकारों को सैनिकों ने बताया कि सामने से लड़ रहे लड़ाके बिना किसी खौफ के गोलीबारी कर रहे हैं.
उन आतंकवादियों को न तो मौत का डर था और न ही वे थक रहे थे. कई मोर्चों पर तो हमलावर खुद को बचाने के लिए छिप भी नहीं रहे थे. जमीनी हकीकत देखकर अमेरिकी टुकड़ियों को समझ आ गया कि ये दुश्मन होश में नहीं, बल्कि किसी भारी नशे की गिरफ्त में हैं.
इसके बाद दुनिया भर के मिलिट्री एक्सपर्ट्स ने युद्ध में रसायनों के इस्तेमाल पर शोध शुरू किया. इसी जांच में कैप्टागन नाम के सिंथेटिक केमिकल का सच सामने आया. पश्चिम एशिया के बाजारों में बेहद कम कीमत पर मिलने और दिमाग को सुन्न कर देने की क्षमता के कारण आतंकवादियों ने इसे अपना मुख्य हथियार बना लिया.
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| समयरेखा | घटना |
|---|---|
| 1960 का दशक | जर्मनी में Captagon विकसित हुई, ADHD इलाज में इस्तेमाल |
| 1980 का दशक | स्वास्थ्य खतरों के बाद अधिकांश देशों में प्रतिबंध |
| 1986 | UN Psychotropic Substances Convention में Fenetylline शामिल |
| सीरिया गृहयुद्ध | Reuters रिपोर्ट — उग्रवादी गुटों द्वारा इस्तेमाल की आशंका |
| 2025 | भारत में पहली बार 227.7 किलो Captagon जब्त |
What is Captagon | कैप्टागन क्या है?
कैप्टागन मूल रूप से एक सिंथेटिक नशीली गोली है जिसे 1960 के दशक में जर्मनी की कंपनियों ने तैयार किया था. इस दवा के भीतर फेनेथिलाइन (Fenetylline) नाम का साल्ट मौजूद होता है, जो सीधे इंसानी दिमाग के सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर हमला करता है. शुरुआत में इसका प्रयोग ध्यान न भटकने (ADHD) और नींद की बीमारी के इलाज के लिए कानूनी तौर पर किया जाता था.
भारत में कितनी बड़ी खेप पकड़ी गई
नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने हाल ही में ‘ऑपरेशन रेजपिल’ (Operation RAGEPILL) चलाकर एक बड़े तस्कर गिरोह को नेस्तनाबूद किया है. एनसीबी के दिल्ली मुख्यालय से जारी आंकड़ों के अनुसार, टीम ने 227.7 किलोग्राम वजनी कैप्टागन टैबलेट और नशीला पाउडर बरामद किया है.
| एनसीबी ऑपरेशन का नाम | Operation RAGEPILL |
| कुल बरामदगी (वजन) | 227.7 किलोग्राम |
| अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत | 182 करोड़ रुपये |
| मुख्य आरोपी की राष्ट्रीयता | सीरिया (Syrian National) |
| कार्रवाई करने वाली एजेंसी | नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) |
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने इस बड़ी कामयाबी पर सुरक्षा बलों की पीठ थपथपाई है. उन्होंने साफ किया कि भारत की धरती पर पहली बार इतनी भारी मात्रा में कैप्टागन बरामद हुई है जिसकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत 182 करोड़ रुपये आंकी गई है. उन्होंने देश को नशामुक्त करने के सरकारी संकल्प को दोहराते हुए कहा कि ऐसे विदेशी सिंडिकेट को जड़ से उखाड़ फेंका जाएगा.
Captagon — Key Facts
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182 करोड़ रुपये की जब्ती: भारतीय सुरक्षा एजेंसी एनसीबी ने देश के इतिहास में पहली बार 227.7 किलो वजनी कैप्टागन बरामद की है.
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सीरियाई नागरिक गिरफ्तार: इस अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी नेटवर्क को चलाने के आरोप में एक सीरियाई मूल के तस्कर को पकड़ा गया है.
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जर्मनी में हुआ था ईजाद: इस खतरनाक केमिकल को सबसे पहले साल 1960 के दशक में जर्मन वैज्ञानिकों ने मेडिकल इस्तेमाल के लिए बनाया था.
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संयुक्त राष्ट्र का कड़ा प्रतिबंध: इसके जानलेवा साइड इफेक्ट्स को देखते हुए यूएन ने 1986 में साइकोट्रोपिक सब्सटेंस कनवेंशन के तहत इसे प्रतिबंधित किया.
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आतंकी संगठन करते हैं इस्तेमाल: आईएसआईएस (ISIS) जैसे हिंसक संगठन अपने लड़ाकों का डर खत्म करने के लिए इस गोली का इस्तेमाल करते हैं.
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गरीबों का कोकीन नाम: बेहद सस्ती दरों पर तैयार होने के कारण अंतरराष्ट्रीय ब्लैक मार्केट में इसे ‘पुअर मैन्स कोकीन’ कहा जाता है।
इसे जिहादी ड्रग क्यों कहते हैं
इस नशीली गोली को ‘जिहादी ड्रग’ का नाम सीरिया के गृहयुद्ध के दौरान मिला, जब आईएसआईएस (ISIS) के ठिकानों से इसके लाखों टैबलेट बरामद हुए. अमेरिकी अखबार ‘वाशिंगटन पोस्ट’ की एक पुरानी खोजी रिपोर्ट में दावा किया गया था कि यह केमिकल सीरिया की जंग को और हिंसक बना रहा है, क्योंकि इसे खाकर लड़ाके खुद को सुपरह्यूमन समझने लगते हैं.
रॉयटर्स की एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस की राजधानी पेरिस में हुए भीषण आतंकी हमलों के दौरान भी हमलावरों ने इसी गोली का सेवन किया था. चश्मदीदों ने बताया था कि आतंकियों के चेहरे के भाव पूरी तरह बदले हुए थे और वे बिना किसी मानवीय भावना के अंधाधुंध गोलियां बरसा रहे थे.
दिमाग पर इसका क्या असर होता है
चिकित्सा विशेषज्ञों के मुताबिक यह दवा इंसानी शरीर में जाते ही एक कृत्रिम ऊर्जा और अत्यधिक आत्मविश्वास भर देती है. इसे खाने के बाद कई दिनों तक भूख नहीं लगती और नींद पूरी तरह गायब हो जाती है.
युद्ध के मैदान में उग्रवादी इसका उपयोग अपनी आक्रामकता बढ़ाने और मौत का डर मिटाने के लिए करते हैं. खाड़ी देशों में अमीर लोग इसका इस्तेमाल रेव पार्टियों में मौज-मस्ती के लिए भी करते हैं, जिसके कारण यह अवैध रूप से पूरी दुनिया में सप्लाई हो रही है.
Key Takeaways
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एनसीबी ने पहली बार भारत में 182 करोड़ रुपये की जिहादी ड्रग कैप्टागन पकड़ी है.
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यह नशा आतंकवादियों के बीच डर मिटाने और आक्रामकता बढ़ाने के लिए मशहूर है.
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मूल रूप से जर्मनी में बनी इस दवा पर संयुक्त राष्ट्र 1986 में ही बैन लगा चुका है.
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अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ते दामों पर मिलने के कारण इसे गरीबों का कोकीन भी कहते हैं.
FAQ
Q: कैप्टागन ड्रग को जिहादी ड्रग क्यों कहा जाता है?
A: इसे जिहादी ड्रग इसलिए कहते हैं क्योंकि आईएसआईएस (ISIS) के आतंकी हमलों में इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल पाया गया है. सीरिया और इराक के युद्ध में उग्रवादी इस गोली को खाकर लड़ते थे ताकि उनका डर खत्म हो जाए. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पेरिस हमले के आतंकियों ने भी इसका सेवन किया था.
Q: भारत में कैप्टागन की कितनी बड़ी खेप पकड़ी गई है?
A: भारत में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने ‘ऑपरेशन रेजपिल’ के तहत 227.7 किलोग्राम कैप्टागन जब्त की है. पकड़े गए नशे की कुल कीमत करीब 182 करोड़ रुपये है. इस मामले में जांच एजेंसियों ने एक विदेशी सीरियाई नागरिक को भी दबोचा है.
Q: क्या कैप्टागन का इस्तेमाल कभी इलाज के लिए भी होता था?
A: हां, 1960 के दशक में जर्मनी में इसका निर्माण चिकित्सा कार्य के लिए ही हुआ था. तब डॉक्टर इसका उपयोग हाइपरएक्टिव बच्चों (ADHD) और नींद की बीमारी नार्कोलेप्सी के मरीजों को ठीक करने के लिए करते थे. बाद में इसके खतरों को देखकर इस पर पूरी दुनिया में पाबंदी लगा दी गई.
Q: पुअर मैन्स कोकीन किस नशीली दवा का दूसरा नाम है?
A: कैप्टागन टैबलेट को ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में ‘पुअर मैन्स कोकीन’ (गरीबों की कोकीन) कहा जाता है. यह एक सिंथेटिक नशा है जो असली कोकीन के मुकाबले बेहद कम लागत में लैब के भीतर तैयार हो जाता है. सस्ते दाम के कारण इसकी तस्करी संघर्ष वाले इलाकों में ज्यादा होती है.
Q: संयुक्त राष्ट्र ने कैप्टागन पर कब प्रतिबंध लगाया था?
A: संयुक्त राष्ट्र ने साल 1986 में साइकोट्रोपिक सब्सटेंस कन्वेंशन की सूची में शामिल करके कैप्टागन पर वैश्विक प्रतिबंध लगाया था. इससे पहले 1980 के दशक की शुरुआत में ही इसके गंभीर मानसिक और शारीरिक खतरों को देखते हुए अधिकांश देशों ने इस पर रोक लगा दी थी.
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