मध्य पूर्व संकट एक नए और ख़तरनाक मोड़ पर है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने धमकी दी है कि ‘ईरान को एक ही रात में ख़त्म किया जा सकता है।’
ट्रंप ने कहा कि अगर ईरान उनकी दी गई डेडलाइन से पहले अमेरिका से डील करने में नाकाम रहता है, तो वो रात कल (मंगलवार) की भी हो सकती है।
ट्रंप की डील के मुताबिक़ ईरान को होर्मुज़ स्ट्रेट खोलना होगा — वही होर्मुज़ जलडमरूमध्य जहां से दुनिया भर की तेल सप्लाई का 20 फ़ीसदी हिस्सा ट्रांसपोर्ट होता है। यह डेडलाइन मंगलवार को वॉशिंगटन डीसी समयानुसार रात 8 बजे यानी भारतीय समयानुसार बुधवार सुबह 5.30 बजे ख़त्म हो रही थी।
व्हाइट हाउस में बोलते हुए ट्रंप ने कहा कि उनका मानना है कि ईरान के मौजूदा नेता ‘अच्छी नीयत’ से बातचीत कर रहे हैं, लेकिन नतीजा अब भी अनिश्चित बना हुआ है।
इस बीच, ईरान ने अस्थायी युद्धविराम के प्रस्तावों को ख़ारिज कर दिया है। इसके बजाय उसने संघर्ष को स्थायी रूप से ख़त्म करने और प्रतिबंध हटाने की मांग की है।
Donald Trump बोले — ईरान को एक रात में खत्म कर सकते हैं
अमेरिकी ज्वाइंट चीफ़्स ऑफ़ चेयरमैन जनरल डान केन और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ भी ट्रंप के साथ इस प्रेस कॉन्फ़्रेंस में मौजूद रहे।
पिछले सप्ताह ही अमेरिकी सुरक्षा बलों ने दक्षिणी ईरान में मार गिराए गए एक एफ़-15 लड़ाकू विमान के दो क्रू सदस्यों को सफलतापूर्वक रेस्क्यू किया था।
युद्ध अपराध की चेतावनी — अंतरराष्ट्रीय कानून क्या कहता है?
कानूनी विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ईरान के नागरिक बुनियादी ढांचे पर जानबूझकर और लगातार हमले अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत युद्ध अपराध की श्रेणी में आ सकते हैं।
बराक ओबामा प्रशासन के दौर के नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के एक पूर्व क़ानूनी सलाहकार ने सीबीएस से कहा, “सभी पावर प्लांट्स तबाह कर देना और नागरिक आबादी पर दबाव बनाकर सरकार को बातचीत की मेज पर लाने की धमकी देना पूरी तरह ग़ैरक़ानूनी है।”
लेकिन प्रेस कॉन्फ़्रेंस से पहले युद्ध अपराध के सवाल पर ट्रंप ने कहा था कि वह इसे लेकर ‘चिंतित नहीं’ हैं। प्रेस कॉन्फ़्रेंस में उन्होंने ज़ोर देकर कहा, “ईरान की जनता आज़ादी के लिए कष्ट सहने को तैयार होगी, भले ही ईरान की सरकार को गिराना मेरा मक़सद न हो।”
राष्ट्रपति ने अमेरिका के प्रमुख सहयोगियों — जिनमें नेटो, ब्रिटेन और दक्षिण कोरिया भी शामिल हैं — पर भी निशाना साधा। उनका कहना था कि संघर्ष के दौरान ये देश अमेरिका की मदद के लिए आगे नहीं आए।
उन्होंने कहा, “यह नेटो पर ऐसा दाग है जो कभी नहीं मिटेगा।”
उन्होंने यह भी कहा कि “अमेरिका को ब्रिटेन की ज़रूरत नहीं है।”
अमेरिकी सेना की सेंट्रल कमांड के ताज़ा अपडेट के मुताबिक़ 28 फ़रवरी को युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिकी बल ईरान में 13,000 से ज़्यादा हमले कर चुके हैं।
ईरान ने युद्धविराम ठुकराया — स्थायी शांति और प्रतिबंध हटाने की मांग
ट्रंप की धमकी के जवाब में ईरान ने ‘अस्थायी युद्धविराम’ को साफ़ तौर पर ठुकरा दिया है। उसकी मांग है कि संघर्ष का स्थायी अंत हो — सिर्फ कुछ दिनों की राहत नहीं।
अपनी आधिकारिक न्यूज़ एजेंसी IRNA में प्रकाशित अपने प्रस्ताव में ईरान ने तीन शर्तें रखी हैं:
- उस पर लगे प्रतिबंध हटाए जाएं
- होर्मुज़ स्ट्रेट से जहाज़ों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने में उसका सहयोग किया जाए
- और हमलों से क्षतिग्रस्त उसके नागरिक ढांचों के पुनर्निर्माण में सहयोग किया जाए
ईरान ने अमेरिकी-इसराइली हमलों के जवाब में इसराइल और अन्य पड़ोसी इलाकों पर मिसाइल हमले जारी रखे हैं।
अमेरिका-ईरान तनाव अभी किस दिशा में जाएगा — यह सवाल दुनिया के तमाम राजनयिकों के सामने भी खुला है। होर्मुज़ स्ट्रेट से जुड़ा यह टकराव सिर्फ दो देशों का मसला नहीं रहा — तेल पर निर्भर हर अर्थव्यवस्था इसे नज़दीक से देख रही है।
FAQ — लोग अक्सर यह पूछते हैं
क्या ट्रंप सच में ईरान पर बड़ा हमला कर सकते हैं?
यह सवाल सिर्फ आप नहीं, दुनिया के कई रणनीतिकार भी पूछ रहे हैं। अमेरिकी सेंट्रल कमांड पहले ही 13,000 से ज़्यादा हमले कर चुकी है, तो ‘क्या वो हमला करेंगे’ का जवाब तो मिल चुका है। असली सवाल यह है कि क्या वो ईरान के ऊर्जा बुनियादी ढांचे — जैसे पावर प्लांट और पुल — को निशाना बनाएंगे। कानूनी विशेषज्ञ कह रहे हैं कि ऐसा करना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन होगा। ट्रंप का कहना है कि वो इसकी परवाह नहीं करते — जो खुद एक बड़ा राजनयिक संकेत है।
होर्मुज़ स्ट्रेट बंद होने से भारत पर क्या असर पड़ेगा?
भारत अपनी ज़रूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है, और उसका एक बड़ा हिस्सा होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर आता है। अगर यह रास्ता बंद हुआ या अस्थिर हुआ, तो पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें तेज़ी से चढ़ सकती हैं। 2019 में जब इस क्षेत्र में तनाव बढ़ा था, तब कच्चे तेल की कीमत कुछ ही दिनों में 15% उछल गई थी। भारत के लिए यह सिर्फ तेल का मसला नहीं — खाद से लेकर ट्रांसपोर्ट तक हर चीज़ पर असर पड़ेगा। अभी के लिए सरकार शायद रणनीतिक तेल भंडार पर नज़र रख रही है।
ईरान ने अमेरिका की डेडलाइन क्यों नहीं मानी?
ईरान की स्थिति यह है कि वो एक अस्थायी राहत के बदले अपनी स्थायी मांगें नहीं छोड़ेगा। अधिकारियों के मुताबिक़ संचार व्यवस्था ठप होने की वजह से जवाब देने में भी औसतन एक दिन लग रहा है — यानी डेडलाइन की राजनीति और ज़मीनी हकीकत में बड़ा फ़र्क है। ईरान चाहता है कि पहले प्रतिबंध हटें, फिर बात हो। अमेरिका चाहता है कि पहले होर्मुज़ खोला जाए, फिर बात हो। यह गतिरोध तब तक नहीं टूटेगा जब तक कोई एक पक्ष झुकने को तैयार न हो।
क्या पाकिस्तान और तुर्की की मध्यस्थता काम करेगी?
ईमानदारी से कहें तो इस पर कोई एक जवाब नहीं है। पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र तीनों अपने-अपने तरीके से दोनों पक्षों से संपर्क में हैं। लेकिन मध्यस्थता तब काम करती है जब दोनों पक्ष कुछ देने को तैयार हों — और फिलहाल न ट्रंप झुकने के मूड में हैं, न ईरान। तुर्की का फ़ायदा यह है कि उसके अमेरिका और ईरान दोनों से काम के रिश्ते हैं। लेकिन नतीजा निकालने के लिए शायद किसी बड़ी राजनयिक सफलता की ज़रूरत होगी।
क्या अमेरिका-ईरान संघर्ष तीसरे विश्वयुद्ध की तरफ़ जा रहा है?
अभी इसे तीसरा विश्वयुद्ध कहना जल्दबाज़ी होगी — लेकिन यह संकट निश्चित रूप से क्षेत्रीय युद्ध की सीमा पार कर चुका है। इसराइल पहले से शामिल है, ईरान मिसाइल हमले कर रहा है, और अमेरिका 13,000 से ज़्यादा हमले कर चुका है। अगर होर्मुज़ स्ट्रेट में कोई बड़ी घटना होती है तो चीन, रूस और खाड़ी देशों की प्रतिक्रिया भी बदल सकती है। फिलहाल यह एक गंभीर द्विपक्षीय-से-क्षेत्रीय संघर्ष है — लेकिन यह और कितना बड़ा होगा, यह आने वाले 72 घंटे बताएंगे।
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