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बहू सास-ससुर का गुजारा भत्ता देने से कर सकती है इनकार — पर पति की संपत्ति का हक नहीं जाएगा – High Court

Aryan Tank
By Aryan Tank On April 3, 2026
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High Court
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बहू सास-ससुर का गुजारा भत्ता देने से कर सकती है इनकार — पर पति की संपत्ति का हक नहीं जाएगा

बुजुर्ग सास-ससुर का सहारा चला जाए और बहू आर्थिक रूप से सक्षम हो — तो क्या कानून उसे गुजारा भत्ता देने के लिए मजबूर कर सकता है? और अगर वह इनकार कर दे, तो क्या पति की संपत्ति में उसका हक खत्म हो जाता है? इलाहाबाद हाई कोर्ट के सामने हाल ही में यही सवाल आया, और अदालत ने कुछ बातें बेहद साफ शब्दों में कह दीं। बहू सास-ससुर गुजारा भत्ता देने के लिए कानूनन बाध्य नहीं है — यह फैसला कई परिवारों के लिए अहम है।

Table of Contents

क्या बहू, सास-ससुर की सेवा से कर सकती है इंकार?

हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक फैमिली मैटर में कहा कि कानूनन बहू अपने सास-ससुर को गुजारा-भत्ता (Maintenance) देने के लिए बाध्य नहीं है। कोर्ट ने कहा कि सामाजिक ताने-बाने में भले ही यह एक जिम्मेदारी लगे, लेकिन कानूनी तौर पर ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट तक कैसे पहुँचा यह मामला?

यह मामला आगरा के एक बुजुर्ग दंपत्ति, राकेश कुमार और उनकी पत्नी से जुड़ा है। उनके बेटे की मृत्यु के बाद, उन्होंने अपनी बहू से गुजारा-भत्ता पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। बुजुर्गों ने दावा किया था कि वे गरीब और अशिक्षित हैं और अब उनका कोई सहारा नहीं है।

पति की मौत के बाद बहू को मिली नौकरी!

बुजुर्ग माता-पिता का तर्क था कि उनके बेटे की मृत्यु के बाद बहू को उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल की नौकरी मिल गई। चूंकि वह आर्थिक रूप से सक्षम है और उसे पति के सेवा लाभ भी मिले हैं, इसलिए उसे अपने सास-ससुर का ख्याल रखना चाहिए।

BNSS धारा 144 के तहत मेंटेनेंस की मांग — और कोर्ट का जवाब

बुजुर्ग दंपत्ति ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144 के तहत अपनी बहू से हर महीने एक निश्चित राशि की मांग की थी। यह वही प्रावधान है जो पहले CrPC की धारा 125 के नाम से जाना जाता था।

फैमिली कोर्ट ने पहले ही उनकी इस मांग को खारिज कर दिया था, जिसे उन्होंने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

नैतिक जिम्मेदारी और कानूनी बाध्यता — दोनों एक नहीं होते

हाई कोर्ट ने कहा कि नैतिकता और कानून दो अलग चीजें हैं। किसी व्यक्ति की अपने बुजुर्गों के प्रति नैतिक जिम्मेदारी हो सकती है, लेकिन जब तक कानून में स्पष्ट रूप से बहू शब्द का उल्लेख नहीं है, तब तक उसे कानूनी रूप से ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

अनुकंपा नियुक्ति का पेंच

कोर्ट ने यह भी गौर किया कि बहू को नौकरी Compassionate Appointment (अनुकंपा नियुक्ति) के आधार पर मिली थी या नहीं — इस बात का कोई सबूत रिकॉर्ड पर नहीं था। यदि नौकरी अनुकंपा के आधार पर मिली होती, तो कुछ विशेष परिस्थितियों में कानूनी जिम्मेदारी तय की जा सकती थी।

लेकिन इस मामले में बहू अपनी मेहनत से पुलिस में भर्ती हुई थी — इसलिए वह पहलू यहाँ लागू नहीं हुआ। ईमानदारी से कहें तो यह एक ऐसा बिंदु है जो परिस्थिति के अनुसार बदल सकता है, इसलिए हर मामले में इसे अलग से जाँचना जरूरी है।

परिवार कानून में बहू की कानूनी स्थिति क्या है?

अदालत ने स्पष्ट किया कि विधायिका ने बहुत सोच-समझकर इस कानून के दायरे में केवल पत्नी, बच्चों और माता-पिता को ही रखा है। इस प्रावधान के तहत सास-ससुर को बहू से मेंटेनेंस माँगने का अधिकार नहीं दिया गया है।

संपत्ति विवाद और सर्विस बेनेफिट्स — मेंटेनेंस में नहीं उलझाए जा सकते

हाई कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि संपत्ति के विवाद या सर्विस बेनेफिट्स के मुद्दों को मेंटेनेंस की कार्यवाही में तय नहीं किया जा सकता। इसके लिए बुजुर्गों को अलग कानूनी रास्ता अपनाना होगा, न कि गुजारा-भत्ता की धारा का सहारा लेना होगा।

क्या बहू खो देगी पैतृक संपत्ति में हक?

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (Hindu Succession Act) के तहत, पति की मृत्यु के बाद पत्नी अपने पति की संपत्ति की पहली वारिस होती है। इसका अर्थ यह है कि पति का पैतृक संपत्ति में जो भी हिस्सा था, उस पर विधवा बहू का कानूनी हक बना रहेगा।

कानूनी हक बना रहेगा — भले ही नैतिक सवाल उठें

बहू को सास-ससुर का खर्च उठाने के लिए कानूनी रूप से मजबूर नहीं किया जा सकता, लेकिन इसका उसके अपने हिस्से की संपत्ति पर मिलने वाले हक से कोई लेना-देना नहीं है। वह अपने पति के हिस्से की संपत्ति का दावा कानूनन कर सकती है।

हालांकि, भारतीय समाज में इसे नैतिक रूप से सही नहीं देखा जाता। कानून और समाज की सोच के बीच यह फर्क अक्सर परिवारों में तनाव की वजह बनता है — और यही इस फैसले की असली अहमियत है। अगर आप इसी तरह की किसी पारिवारिक या संपत्ति विवाद की स्थिति में हैं, तो एक अनुभवी परिवार कानून के वकील से सलाह लेना सबसे व्यावहारिक कदम होगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

क्या बहू सास-ससुर की देखभाल न करे तो पति की संपत्ति से उसका हक खत्म हो जाता है?

नहीं, इन दोनों बातों का आपस में कोई कानूनी संबंध नहीं है। Hindu Succession Act के तहत पति की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति में पत्नी पहली वारिस होती है — यह हक किसी सामाजिक व्यवहार या पारिवारिक जिम्मेदारी निभाने पर निर्भर नहीं करता। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इसी केस में यह बात साफ कर दी। तो अगर किसी ने आपसे यह कहा है कि “सेवा नहीं की तो संपत्ति नहीं मिलेगी” — तो वह कानूनी सच्चाई नहीं है।

BNSS धारा 144 के तहत सास-ससुर बहू से गुजारा भत्ता माँग सकते हैं क्या?

नहीं। BNSS की धारा 144 (पहले CrPC की धारा 125) के तहत पत्नी, बच्चे और माता-पिता मेंटेनेंस माँग सकते हैं — लेकिन इस प्रावधान में सास-ससुर को बहू से गुजारा भत्ता माँगने का कोई अधिकार नहीं दिया गया है। विधायिका ने जानबूझकर इस दायरे को सीमित रखा है। अगर बुजुर्ग माता-पिता बहू से आर्थिक सहायता चाहते हैं, तो उन्हें किसी दूसरे कानूनी रास्ते की तलाश करनी होगी — यह रास्ता उनके लिए बंद है।

अनुकंपा नियुक्ति मिली हो तो क्या बहू की जिम्मेदारी बदल जाती है?

यह एक पेचीदा सवाल है और इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इसे भी उठाया। अगर बहू को पति की मृत्यु के आधार पर Compassionate Appointment मिली हो, तो कुछ विशेष परिस्थितियों में अदालतें अलग दृष्टिकोण अपना सकती हैं — लेकिन यह स्वतः कोई कानूनी दायित्व नहीं बन जाता। इस केस में बहू खुद पुलिस भर्ती परीक्षा पास करके कांस्टेबल बनी थी, इसलिए यह पहलू लागू नहीं हुआ। अगर आपकी स्थिति में अनुकंपा नियुक्ति का सवाल है, तो किसी परिवार कानून के वकील से सलाह लेना समझदारी होगी।

पति की मृत्यु के बाद पत्नी को पैतृक संपत्ति में कितना हिस्सा मिलता है?

Hindu Succession Act की धारा 8 के तहत पति की मृत्यु पर उसकी self-acquired property में पत्नी Class I की वारिस होती है। पैतृक संपत्ति में पति का जो हिस्सा था, उस पर भी पत्नी का दावा बनता है। अगर पति की मृत्यु बिना वसीयत के हुई हो, तो संपत्ति Class I के वारिसों — पत्नी, बच्चे, माँ — में बराबर बँटती है। यानी तीन वारिस हों तो तीनों को एक-एक तिहाई हिस्सा मिलेगा।

क्या सास-ससुर बहू की नौकरी या संपत्ति पर कोई कानूनी दावा कर सकते हैं?

सीधे तौर पर — नहीं। मेंटेनेंस कानून के तहत ऐसा दावा नहीं बनता। लेकिन अगर बहू को पति की सरकारी सेवा से जुड़े लाभ मिले हों — जैसे ग्रेच्युटी, पेंशन, या बीमा राशि — और उन पर कोई विवाद हो, तो सास-ससुर उसे मेंटेनेंस याचिका में नहीं, बल्कि अलग दीवानी मुकदमे में चुनौती दे सकते हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यही रास्ता सुझाया। दोनों मामलों को एक ही कार्यवाही में नहीं मिलाया जा सकता — यह कोर्ट ने साफ कर दिया।

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Aryan Tank is an experienced SEO Content Writer with over 2 years of expertise in digital news writing. He has been consistently contributing high-quality content to DeshTak for the past two years. Aryan specializes in writing on topics such as politics, government schemes, trending news, technology, and viral stories.

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